कहीं से पकड़ूँ तो कहीं से रिसती है
हर किनारे को छोड़ सिर्फ धारा में बस्ती है
जाने कौन से सफर पे
ये मेरी कश्ती है!!
सजीव अंत! इस अस्पताल में, जहाँ हर क्षण जीवन उत्पन्न और विलुप्त हो रहा है, मेरा यह शरीर रोग और पीड़ा से जूझ रहा है मेरे परिजन और अभिक्षक ...
Nice to read some lines from you
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