Monday, September 15, 2014

सम्पूर्ण साक्षात्कार

सम्पूर्ण साक्षात्कार


शीतल पवन करे यूं भ्रमण,
ज्यों चपल चंचला नार कोई,
धवल चांदनी, श्यामल रात,
उज्ज्वल तारे अपार कई,
ऋतु  मीराबाई,
सिमरन करते जो श्याम का
है पागल भई
सुन्दर सुगंध सुमधुर संगीत,
है बज रही पवित्र झंकार कोई,
कोपल कपोल कोमल कोमल,
नहीं मोहिनी यही प्रकार कोई,
अति आनंदित प्रसन्नचित,
कर रहा मुझे विचार कोई,
स्वच्छ मन आनंद विभोर,
मिला रस का सागर कोई,
निष्पाप हुआ जग, सरल सब कर्म,
मलीन नहीं विचार कोई,
मुक्त हृदय, सुशोभित चित्त,
है कर गया श्रृंगार कोई,
हे प्रभु सम्पूर्ण हो,
नहीं ऐसा और साक्षात्कार कोई!

Wednesday, September 10, 2014

A Martyr's epistle

मेरी शौर्यगाथा को मेरी मृत्यु न बनाओ दोस्तों,
आज तुम आंसू न बहाओ दोस्तों!

मुझे जो कन्धों पे उठाया है आज,
मेरी विजय का उत्सव मनाओ दोस्तों
इसे न मेरी शव-यात्रा बनाओ दोस्तों!
आज तुम आंसू न बहाओ दोस्तों!

तुम्हारे जीवन में, तुम्हारे उल्लास में,
जीवित हूँ मैं सदा,
मेरे जीवन को न इतना छोटा बनाओ दोस्तों,
आज तुम आंसू न बहाओ दोस्तों!

*"कन्धों से मिलते हैं कंधें, क़दमों से कदम मिलते हैं,
चलते हैं जब हम ऐसे तो दिल दुश्मन के हिलते हैं,"
चलो, जीत का जश्न  मनायो दोस्तों,
आज तुम आंसू न बहाओ दोस्तों!

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मेरी शहादत को न मेरी कज़ा बनाओ दोस्तों,
आज तुम अश्क़ न बहाओ दोस्तों!

मुझे जो काँधों पर  उठाया है आज,
मेरी फतह का जश्न मनाओ दोस्तों,
इसे  न मेरा जनाज़ा बनाओ दोस्तों,
आज तुम अश्क़ न बहाओ दोस्तों!

तुम्हारी बेख़ौफ़ ज़िन्दगी में ज़िंदा हूँ मैं,
मेरी कुर्बानी को न सज़ा बनाओ दोस्तों,
आज तुम अश्क़ न बहाओ दोस्तों!

बेशक तुम मायुस  हो,
मुझसे जुड़ा होकर,
पर इसे न दिल से लगायो दोस्तों,
आज तुम अश्क़ न बहाओ दोस्तों!

पैरहन हो हंसी का,
और जियो बेइन्तहां,
मेरी मौत को
पैगम्बर ज़िन्दगी का बनाओ दोस्तों,
आज ये करिश्मा कर दिखायो दोस्तों,
आज तुम अश्क़ न बहाओ दोस्तों!

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Let not the tears sog your cheek,
let not my gallantry be my death so meek!
Be it my victory lap
Your shoulders that I am on,
let it not be
an obligatory funeral moan,
Jubilate for that I am alive,
In your fearless life
I continue to survive,
Wear a smile and live, live more,
for it's the vigor of life
even in my death
that I adore!

Monday, August 11, 2014

vaicharik anemia


देश में एनीमिया व्यापक है, ये मैं मानता था,
पर खून की इतनी कमी है , मैं ये न जानता था!

एक बालिका से उसका बचपन चुरा के,
रजस्वला होते ही ब्याह दिया गया,
जीवन सरिता में एक अनजाने देव को
अर्पण कर प्रवाह दिया गया।
उस कोमल कोपल से फिर कहा
तुम हमें एक वृक्ष बीज दो,
तुम सुता नहीं, सुर-सरिता हो,
हमारे कुटुंब को सींच दो,
स्वयं का नारी होना चरितार्थ करो,
हम कृतघ्नों को कृतार्थ करो।
प्रचुर नारी नहीं, गृहलक्ष्मी नहीं,
उस अनभिज्ञ बालक ने गर्भ धारण किया,
हे प्रभु! ऐसा उत्पीड़न तूने किस कारण किया!

जिस रक्त की पहले ही बहुत कमी थी,
गर्भस्थ शिशु की आँखें भी उसी पर जमीं थीं!
अचानक सबको ये आभास हुआ,
अन्याय ये कैसा अनायास हुआ।
जब मन पर पड़ा बोझ,
तो आरम्भ हुई रक्त की खोज!

…………………………………।
रक्त की खोज 
सास ने कहा अपने लाल को,
रोना आता है मुझे देखकर तेरे हाल को,
माना तू इसका पति है, पर तू इस बालक का भी पिता है,
तू रक्तदान कदापि नहीं करेगा,
कमज़ोर पिता की कमज़ोर संतान होती है,
ऐसा शास्त्रों  में लिखा है
हमारी उम्र न हुई होती
तो मैं और तेरे बाबूजी
रक्तदान क्या जीवनदान करते
अपने रक्त से तेरे वंश में प्राण भरते
बहन बोली मैं तो खुद लाचार हूँ,
अपने चार प्रसवों के बाद, जीवन प्रयन्त बीमार हूँ।
पडोसी लेटा हुआ था अपने बिस्तर में औंधा,
रक्तदान के नाम से उसके दिमाग में एक सुझाव कौंधा,
मुझसे तो अपने वज़न के कारण हिला भी नहीं जाता,
वरना क्या मैं तुम्हारे साथ रक्तकोष तक न जाता।
अरे भैय्या अपनी किस्मत आज़माओ,
सुबह सवेरे पार्क चले जाओ।
कहते हैं सभी स्वस्थ लोग वहीँ होते हैं,
और दूसरों का भला करने को आतुर होते हैं।

पार्क में दो महिलाएं गहनों  पर गहन चर्चा करती हुई मिलीं
रक्तदान का नाम सुनते ही बेंच से उछली
हम इन चक्करों में नहीं पढ़ते,
न जाने लोग कैसी कैसी कहानियां हैं गढ़ते!
हमने तो अपना नुक्सान नहीं किया
जीवन में कभी रक्तदान नहीं किया!
सुना है रक्त से नई -नई बिमारीयाँ होती हैं,
अरे हम गृहणियाँ  क्या रक्तदान के लिए होती हैं?

जॉगिंग करते हुए भाईसाहब ने ज्ञान दिया,
आपने ब्लड बैंक से क्यों नहीं लिया,
अच्छी क्वालिटी जैसे ऐ प्लस ले लेना,
आजकल मार्किट में क्या नहीं मिलता,
बस थोड़े पैसे दे देना।

ताली योग करते हुए सज्जन ने पहले ताली पीटी
फिर कहा मुझे तो है डायबिटीज
और फिर से ताली बजाई
मानों रक्तदान की खिल्ली उड़ाई

गंजे महानुभाव ने चिढ कर किया बखान
कमी तो सभी में है,
क्या कोई हमें करेगा केशदान।

कपाल भाँती करते हुए अकाउंटेंट ने कहा
चार सौ सी सी का कॉन्ट्रिब्यूशन!
हम तो पहले ही कर चुके है,
एट्टी सी सी में डोनेशन।

एक युवा एग्जीक्यूटिव ने हाथ पे लगी बैंडऐड दिखाई
मैंने तो कल ही खून दिया है,
अभी तो रिपोर्ट भी नहीं आई।
 
हताश हो मित्र से कहा, "मित्र खून नहीं मिला",
"अरे उसका तो अभी आविष्कार ही नहीं हुआ
तुमने अखबार में नहीं पढ़ा"।

एक-एक कर अनेकोअनेक लोग आये,
कुछ दौड़ते, कुछ चलते, और कुछ थे कुत्तों को साथ लाये,
स्वयं का स्वास्थ्य  लाभ सभी का प्रयोजन था,
पर न कोई भी कर सका रक्त का संयोजन था!
…………………………………………।

किन्तु खोज से मिलता वो है जो हो चाहे वो गुप्त है,
आजकल नसों में तो स्वार्थ दौड़ता है, रक्त तो हो चुका लुप्त है।
शारीरिक एनीमिया का फिर भी उपचार है,
दृष्टिकोण की रक्ताल्पता से समाज लाचार है,
अफ़सोस! रक्त किसी कारखाने में नहीं बनता,
और शुक्र है की इसका शिल्पगृह हम सभी के पास है,
हम रक्त का स्रोत हैं या हमको वैचारिक एनीमिया है,
ये तो अपना अपना आभास है!

Thursday, August 7, 2014

Dhyey mere jeevan ka, aur meri mrityu ka...

कहने को केवल इक दिशा है,
किन्तु निर्भर इसीपर  मेरी सम्पूर्ण मनोदशा है!
प्रतिदिन, आँखें जमाये शत्रु पर
अविरल खड़ा मैं सीमा पर
जब पूछते हैं नेत्र मेरे की कैसे है रिपु पहचाना जाता,
सटीक उत्तर है मेरा, 'दिशा' जहाँ से वो आता!
मैंने भी उसको देखा नहीं है,
किन्तु जानता  हूँ की ये दिशा सही नहीं है!

यूं तो मैंने उनको भी नहीं देखा,
जिनके वास्ते मैं युद्ध करता हूँ,
अनजाने हैं वो, जिनके लिए मैं
सरहद पर मरता हूँ,
मेरे पीठ-पीछे से आती है जो दिशा
उसी को पीठ दिखा सकता हूँ कैसे भला!

अज्ञात है मेरा शत्रु,
अपरिचित ही हैं, मेरे अपने भी,
किन्तु मैं भी अनभिज्ञ  हूँ,
उस भय से जो शत्रु मेरी आँखों में है खोजता
निष्चय दृढ़ है,
वक्ष पर गोली खाने को
न एक पल भी हूँ मैं सोचता

चाहे वो मेरे मित्र न सही,
निश्चित ही वो मेरे स्वजन हैं,
न्यौछावर उन पर करू,
इसी हेतु हुआ मेरे जीवन का सृजन है,
किसी व्यक्ति से नहीं,
फिर भी ये युद्ध मेरा व्यक्तिगत है,
क्यूंकि न केवल उनका जीवन,
अपितु उनकी हंसी भी
मेरी धरोहर है,
रक्षा करूँ  अपने राष्ट्र-कुटुंब की
मेरे जीवन का ही नहीं,
मेरी मृत्यु का भी और कोई
ध्येय नहीं!
इससे अधिक प्राप्त हो,
ऐसा कोई श्रेय नहीं!

Wednesday, March 19, 2014

ye kaisa vasl

ये जो तेरी लम्बी सी आह आई है,
                                                 तू ही बता, दुआ है या दुहाई है?
रु-ब -रु होते ही जो तेरे माथे पे शिकन आयी है,
                                                  इसको वस्ल कहूं या जारी अभी जुदाई है?

ज़िक्र पूरे ज़माने का है, तेरी-मेरी बातों में,
                                                            बस तेरा-मेरा ज़िक्र नहीं,
दिखा रहें हैं दोनों की फ़िक्र तमाम कायनात की  है,
                                                             बस तेरी-मेरी फ़िक्र नहीं,
हम शायद तिफ़्ल थे,
                               पर रिश्ता अपना जवान था,
कभी और कुछ नहीं था,
                                   बस हम दोनों से ही जहान था,

अब बस हम नहीं हैं, मैं हुँ, तू है और पूरी खुदाई है,
                                     तेरी तिरछी सी हंसी में, हंसी शायद नहीं है,
पर तेरी काँपती  पलकों में
                                  यक़ीनन एक रुनाई है,
मैंने कब तुझसे शिकवा किया है,
                                      पर ये भी जानता हूँ,
मेरी काफ़िर निगाहों ने
                                  तुझे एक कहानी सुनाई है!!

Tuesday, March 18, 2014

tu meri ho..li!

देख-देख रंग, रंग संग उड़े है उमंग,
बिन डोर कि पतंग,
मन हो रहा मलंग,
रंग ने रंगा जो रूप तेरा, तेरा रूप-रंग
देखूं तो हूँ दंग, न देखूं तो भी तंग!
रंग ने मिलाई भंग गोरी तेरे रूप में,
मन में उठी तरंग देखो भरी धूप में!

कैसे हैं करारे,
गोरी तेरे गार प्यारे,
हैं जीने के सहारे,
या लेंगे चैन हमारे,
धीरे-धीरे मारे जो तू पिचकारी धारे
ध्यान संग प्रान भी खींच ले हमारे। 

परा जो पानी तोहपे, बदला रंगों के ताल में,
गिरते-गिरते कह रहा, न छोड़ो इस हाल में,
कर रही कमाल तू होरी के धमाल में,
या होरी का बवाल है तेरे ही जमाल में। 

जैसे रंग मिल रहे,
यों तोहसे मिलने कि गुहार है,
अपनी नहीं ये,
इनकी भी मनुहार है,
नशा है तेरे रूप का,
या होरी की  फुहार है,
 बावरे हुए हैं बस,
ये ही समाचार है,
ये ही समाचार है!

Tuesday, March 4, 2014

rahu kalam

जैसे कि ' राहु काल' था,
अचानक सर से हट गया,जो  बवाल था।
कभी क्या खूब था,
फिर गया  सारा तिलस्म डूब था।
फिर नज़र आने लगा है एक ताज महल
फिर उसमे क़दमों कि है चहल-पहल,
जनाब! मैं तो वोही था, हूँ और है मुमकिन,
कि रहूँ,
ये तो आपकी शाही नज़र है,
जो कभी नज़रे-शिकायत थी,
वो फिर नज़रे-इनायत है,
यूं लगता है कभी, कि हमारी ज़िन्दगी
सफाई देने कि एक कवायद है।
अरे अरे रुको, चल दो न यूँही
ये शिकायत नहीं, ये तो मेरी खुद से गुफ़तगू है,
कम से कम अभी तो  नज़रे करम है
इतना ही सुकून है!

Sajeev ant!

सजीव अंत - चले जाने के बाद भी ! सीमित है समय जितनी चलनी है जीवन लय पर याद रहूँ मैं सदा जाने के बाद भी,  इसीलिए कुछ करना चाहता हूँ जीते हु...